चीन ने इस बार एक अच्‍छा फैसला लिया है…..

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कोरोना महामारी को लेकर दुनिया भर के निशाने पर रहने वाला चीन एक बार फिर खबरों में है। दरअसल
चीन की सरकार अपने देश में एक अनोखी नीति बना रही है जिसमें खाना बर्बाद करने पर वहां के लोगों
और रेस्तरां पर जुर्माना लगाया जाएगा। यह नीति वहां के राष्ट्र प्रमुख शी चिनफिंग के ऑपरेशन एम्प्टी प्लेट
यानी खाली थाली के अंतर्गत लागू की जा रही है, ताकि लोगों को उतना ही खाने के लिए प्रेरित किया जा
सके जितनी जरूरत है और खाने की बर्बादी पर लगाम लगाई जा सके। इन नए नियमों के मुताबिक प्लेट
में खाना छोड़ने पर भारी जुर्माना लगाने का प्रस्ताव है।

हो सकता है कि आपको यह खबर सामान्य लगे, लेकिन यह विषय चीन ही नहीं, बल्कि भारत समेत संपूर्ण
विश्व के लिए जितना मामूली सा प्रतीत होता है उससे कहीं अधिक गंभीर है। अगर यह कहा जाए कि भोजन
अथवा खाद्य पदार्थो की बर्बादी मानव सभ्यता के सामने वर्तमान में महत्वपूर्ण चुनौतियों में से एक है तो
अतिशयोक्ति नहीं होगी। आपको जानकर आश्चर्य होगा कि विश्व भर में जितना भोजन उगाया या बनाया
जाता है उसमें से लगभग 35 प्रतिशत तक अनेक स्तरों पर बर्बाद हो जाता है। इस बर्बाद भोजन की कीमत
अगर आंकी जाए तो लगभग एक अरब डॉलर होगी।

भारत की अगर बात करें तो 2017 की एक रिपोर्ट के अनुसार हम लोग एक साल में उतना भोजन बर्बाद
कर देते हैं जो ब्रिटेन जैसे देश की कुल खपत के बराबर है। यूनाइटेड नेशंस डेवलपमेंट प्रोग्राम के मुताबिक
भारत में लगभग 210 लाख टन गेहूं हर साल बर्बाद होता है जो ऑस्ट्रेलिया में होने वाले कुल उत्पादन के
बराबर है। वर्ष 2018 के बीएमसी के आंकड़े बताते हैं कि मुंबई में रोजाना निकलने वाले कचरे में से 73
प्रतिशत फल-सब्जी और भोजन होता है।

देश भर में बर्बाद होने वाले खाद्य पदार्थो के आंकड़े हमें बताते हैं कि लगभग 6.7 करोड टन भोजन हमारे
देश में बेकार चला जाता है जिसकी कीमत 92,000 करोड़ रुपये के लगभग बैठती है। दुनिया भर में जब
80 करोड़ लोग भूखे पेट सोने के लिए विवश हों तो इस प्रकार के तथ्य केवल अर्थव्यवस्था या पर्यावरण के
लिहाज से ही चिंताजनक नहीं होते, अपितु नैतिकता के आधार पर भी शर्मनाक होते हैं। हमारे लिए यह गहन
चिंतन का विषय होना चाहिए कि ग्लोबल हंगर इंडेक्स यानी वैश्विक भूख सूचकांक 2020 की रिपोर्ट में 107
देशों की सूची में भारत का स्थान 94 नंबर पर है।