प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सोमवार को असम के धेमाजी पहुंचे।

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गुवाहाटी से लगभग 400 किलोमीटर दूर स्थित धेमाजी पुरातन इतिहास, कला-संस्कृति के साथ बाढ़ त्रसदी का
भी गवाह रहा है। ब्रह्मपुत्र नदी के उत्तर में बसे इस जिले के पिछले हिस्से में अरुणाचल बसा है। जहां से हिमालय
की पहाड़ियां नजर आती हैं। हिमालय और ब्रह्मपुत्र नदी की वजह से यहां की धरती में कई तरह की वनस्पतियां
हैं।

भारत-चीन लड़ाई से लेकर उल्फा के हमले झेल चुका है धेमाजी : अरुणाचल प्रदेश की सीमा से सटा यह
शहर ऐतिहासिक अहोम राजाओं से जुड़े स्थानों से लेकर वर्ष 1965 की भारत-चीन लड़ाई और वर्ष 2004 में
उल्फा उग्रवादियों द्वारा किए गए बम हमले (जब धेमाजी स्कूल के बहुत से छात्र मारे गए थे) असम के इतिहास
में इस जिले की उपस्थिति को दर्शाते हैं।

धेम खेमली से बना धेमाजी : धेमाजी का बाढ़ से पुराना नाता रहा है। मान्यता थी कि यहां की एक नदी थी जो
बार-बार अपना पाट (किनारा) बदल लेती थी। इसकी वजह से किसी भी समय अप्रत्याशित रूप से बाढ़ आ जाती
थी। गांववाले इसे बुरी आत्मा का साया मानते हुए कहते थे कि नदी के लिए यह धल धेमली यानी खेल का मैदान
है। इसका ही अपभ्रंश है धेमाजी। समय बदला लेकिन बाढ़ जस की तस है।

बुनाई का पारंपरिक कौशल : धेमाजी की मूल निवासी महिला बहुत अच्छी बुनाई करती है। यह पंरपरागत तरीके
से पीढ़ी दर पीढ़ी स्थानांतरित होती चली आ रही है। माना जाता है कि यहां की महिलाओं में प्राकृतिक रंगों के संबंध
में इनका ज्ञान बहुत खास होता है। पारंपरिक रूप से कपास की खेती कर रुई तैयार करना और उस धागे से कपड़े
तैयार करना इनकी दिनचर्या में शामिल है। इन कपड़ों को मेंडि कहते हैं। जैकेट, तौलिया, मफलर, चादर और शॉल शामिल है। 170 से ज्यादा बुनकरों की सहकारी संस्थाएं हैं।