अनाड़ियों के हाथों में मासूमों की जान, बिना लाइसेंस और फिटनेस दौड़ रहे वाहन …

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टिहरी में मंगलवार सुबह स्कूली बच्चों को ले जा रही मैक्स के हादसे को लेकर बच्चों की परिवहन सुविधा
और सुरक्षा पर फिर सवाल उठ खड़े हुए हैं। पहाड़ी क्षेत्रों में तो सार्वजनिक वाहन सुविधा की तरफ राज्य
सरकार की नजरें दशकों से फिरी हुई हैं, लेकिन मैदानी क्षेत्रों में भी हालत बेहद सुधरे हुए नहीं हैं।

बात अगर राजधानी दून की करें तो यहां भी स्कूली वाहन अनाड़ियों के हाथों में दौड़ रहे। न तो चालकों के
पास ड्राइविंग लाइसेंस होते, न ही वाहन फिटनेस टेस्ट प्रमाण-पत्र हासिल किए होते। पब्लिक स्कूलों की
बसें तो फिटनेस और टैक्स बगैर ही दौड़ती मिलती हैं।

वैन और ऑटो में तो बच्चे भेड़-बकरियों की तरह ठूंसे जा रहे हैं और ई-रिक्शा में तमाम सुरक्षा को
दरकिनार कर बच्चों का परिवहन किया जा रहा। यह परवाह जिम्मेदार सरकार, जिला प्रशासन के
और परिवहन विभाग को है न मोटी फीस वसूल रहे स्कूल प्रबंधनों को।

हाईकोर्ट ने पिछले साल जुलाई में स्कूली वाहनों के लिए नियमों की सूची जारी की तो सरकार और
प्रशासन कुछ दिन हरकत में नजर आए। इस सख्ती के विरुद्ध ट्रांसपोर्टर हड़ताल पर चले गए और
सरकार बैकफुट पर आ गई।

नतीजा ये हुआ कि बच्चों को ले जाने वाले वाहनों में धींगामुश्ती का खेल फिर शुरू हो गया। तीन महीने
पहले मई में दून के प्रेमनगर इलाके में एक स्कूल बस में चालक-परिचालक की लापरवाही से महज साढ़े
तीन साल का मासूम अंश गिरकर बुरी तरह जख्मी हो गया था। इस हादसे के बाद कुछ दिन परिवहन
विभाग ने स्कूली वाहनों की चेकिंग कर कार्रवाई की, पर इसके बाद हालात फिर वही हो गए।