अमृतसर में दर्दनाक हादसे के बाद जिम्मेदारी से भागते जिम्मेदार

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गत शुक्रवार विजयदशमी की पावन शाम अमृतसर में एक हृदयविदारक घटना घटी। रेल पटरियों पर खड़े होकर रावण दहन देख रही भीड़ को एक तेज रफ्तार ट्रेन ने चपेट में ले लिया। मात्र दस सेकेंड में 61 लोगों की मौत हो गई और 70 से अधिक घायल हो गए। जितना भयावह यह हादसा था, उससे कहीं अधिक भयावह और विचलित कर देने वाला मंजर बाद के दिनों में देखने को मिला।

आंसू, आक्रोश और दर्द से भरी व्यथित कर देने वाली अनेक कहानियों के बीच सामने आया एक ऐसा प्रकरण जिसने उजागर किया उदासीनता और निष्क्रियता से पूर्ण रूप से ग्रस्त हो चुकी राजनीतिक और प्रशासनिक व्यवस्थायों को। एक ऐसा प्रकरण जहां सब जिम्मेदार अपनी-अपनी जिम्मेदारियों से भागते दिखे… कोई लोगों के गुस्से के डर से घटना के तुरंत बाद स्टेज से भागा तो कोई गिरफ्तारी के डर से घर से ही भाग गया। …और जिन अन्य को आम जनता ने जिम्मेदार समझ अपने परिवार, अपने समाज या अपने देशवासियों की सुरक्षा की जिम्मेदारी सौंप अपना नुमाइंदा चुना, वह सब या तो प्रथम दृष्ट्या ही ‘क्लीन चिट’ देकर पूरे प्रकरण से पल्ला झाड़ गए या फिर घटना के 17 घंटे बाद औपचारिक दौरा कर राजकीय शोक और एक मजिस्ट्रेट जांच के आदेश जारी कर विदेश दौरे पर पुन: निकल गए। उसी दौरे पर जिसे मीडिया के कैमरों के समक्ष रद बताकर अपने ‘जिम्मेदार और जवाबदेह’ होने का अहसास करवाने की भरपूर कोशिशें की गई।

हादसे के लिए कौन जिम्मेदार कौन है? यह सवाल बेशक हर किसी की जुबां और जहन में है। इसका जवाब अभी नहीं तो कुछ दिन या फिर महीनों बाद जांच पूरी होने पर मिल ही जाएगा, लेकिन उस सबसे बड़े सवाल कि ‘क्या सरकार जिम्मेदार है? ..है तो जिम्मेदारी से भागती क्यों है?’ का जवाब जो अमृतसर जैसी हर घटना के बाद उठता रहा है, का उत्तर शायद किसी के पास नहीं है। हमारा हिंदुस्तान धर्म परायण देश है। यहां एक नहीं, अनेक उत्सव मनाए जाते हैं।

पंजाब के अमृतसर में हुआ दिल दहला देने वाला हादसा पहला नहीं है। देश में इससे पहले भी अनेक समारोहों ( धार्मिक या सामाजिक) के दौरान कई ऐसी भीषण घटनाएं हो चुकी हैं। लेकिन इन घटनाओं से न तो कभी सरकारों ने सबक लिया और न ही आयोजकों ने।