आकस्मिक हमसफ़र

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 नई दिल्ली रेलवे स्टेशन पर एक आदमी कुली ढूंढ रहा था। गोरा रंग, उम्र कोई 32, भरा हुआ शरीर, चेहरा दिखने में तो हंसमुख था पर उसके चेहरे पर दूर-दूर तक खुशी की कोई लहर तक नहीं थी। शांत था, मानो मुस्कुराए हुए भी एक अरसा बीत गया हो लगेज़ इतना ज्यादा भी नहीं था कि वो खुद नहीं उठा पाए पर फिर भी किसी वजह से उसने कुली बुलाना ही लाज़मी समझा।  तभी जो़र से कुली कुली की आवाज लगाता हुआ एक आदमी उसके पास आया और बोला हां साहब सामान उठाना है क्या ?

हां अभी कालका शताब्दी आती होगी उसी में रखना है।

वो ट्रेन तो आधे घंटे लेट है साहब।  कुली ने बताया।

क्या ? ट्रेन लेट  है? इतना सुनते ही आदमी थोड़ा झल्लाते हुए बोला अच्छा ठीक है मैं उधर बेंच पर बैठा हूं जब ट्रेन आ जाए तो आ जाना।

ठीक है साहब कुली बोला और फिर से कुली कुली की तेज आवाज लगाते हुए भीड़ में गुम हो गया।

 रेलवे स्टेशन की दुनिया कोई और ही दुनिया होती है । चारों तरफ अफरा-तफरी, शोरगुल, नए चेहरे, ट्रेनों की धड़धड़ाती आवाजें आैर हर तरफ लोग ही लोग, कोई ट्रेन का इंतजार कर रहा होता तो कोई ट्रेन से आने वाले का । यह स्टेशन भी कितने अजीब होते हैं ना? खुद तो कहीं नहीं जाते पर रोज़ न जाने कितने हजा़र लोगों को उनकी मंजिल तक पहुंचा देते हैं।

आदमी बेंच पर बैठा था और फोन पर किसी से बात कर रहा था।

ट्रेन लेट है बाबा, बोला था ना एयर टिकट करा दो पर आपको तो सुननी नहीं होती।

 अरे बेटा हमेशा हवाई जहाज से ही तो जाते हो सोचा ट्रेन से जाओगे तो अच्छा रहेगा  तुम्हें अच्छा लगेगा।

हां ठीक है बाबा फिर से वही बात शुरू मत कर देना चलो बाए ट्रेन आती होगी अपना ध्यान रखना।

अरे बेटा सुनो, बुजुर्ग व्यक्ति कुछ कहने वाले थे कि आदमी ने पहले ही टोक दिया,  हां ठीक है पहुंच कर फोन कर दूंगा।

फोन कटने के बाद आदमी थोड़ा गंभीर हो गया था मानो कोई दुख का पहाड़ एकदम से उस पर टूट पड़ा हो। जैसे कोई पुरानी दर्द भरी याद एकदम से उसके मन में घर कर गई हो। उसकी आंख थोड़ी नम हो आई थी।

साहब ट्रेन 2 मिनट में आने वाली है कुछ खाने पीने का सामान लेना हो तो ले लो।

सफ़र कोई जादा लंबा नहीं था यही कोई 6 घंटे तो इसलिए आदमी ने पानी की बोतल ही ली।

 गाड़ी नंबर 12012 कालका शताब्दी प्लेटफार्म नंबर 2 के बजाय प्लेटफॉर्म 6 पर खड़ी है। यह अनाउंसमेंट सुनते ही कुली ने सामान उठा लिया और आदमी उसके पीछे हो लिया। d2 कोच की नीचे वाली बर्थ पर सीट नंबर 37, आदमी ने टिकट दोहराया। यह एक विंडो सीट थी। आमतौर पर तो लोग विंडो सीट बहुत पसंद करते हैं लेकिन इस आदमी ने उस में कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई चुपचाप अपना सामान सीट के नीचे रखा और बैठ गया।

स्टेशन मास्टर ने हरी झंडी दिखाई ट्रेन ने हौर्न दिया और धीरे-धीरे स्टेशन पर खिसकने लगी। ट्रेन ने स्पीड पकड़ ली थी और प्लेटफार्म खत्म होने वाला था तभी एक लड़की हांफ़ती हुई आदमी की बगल वाली सीट पर आई। लग रहा था जैसे ट्रेन पकड़ने के लिए उसे दौड़ना पड़ा हो।

 d2 कोच सीट नंबर 36 यही है ना? उसने  आदमी की तरफ देखते हुए पूछा तो उसने हां में सिर हिला दिया।

थैंक गौड मुझे ट्रेन मिल गई वरना तो निकल ही गई थी। उसने आदमी की तरफ देख कर कहा पर आदमी ने कोई जवाब नहीं दिया। लड़की फिर बोली 

 अगर आप बुरा ना माने तो मैं विंडो साइड बैठ जाऊं मुझे बहुत पसंद है? आदमी ने एक बार नजरअंदाज  करते हुए उसे देखा और बोला हां ठीक है और लड़की को विंडो सीट ऑफर कर दी। लड़की की मानो कोई खुशी की सीमा ही ना हो। शायद उसे ट्रेन और उसकी विंडो सीट कुछ ज्यादा ही पसंद थी।

 आपका बहुत-बहुत शुक्रिया लड़की बोली।

 ठीक है कोई बात नहीं आदमी ने बिना उसकी तरफ देखें ही जवाब दिया।

 बाय द वे मेरा नाम वृंदा है। वृंदा गुप्ता। नाम सुनते ही आदमी ने उसकी तरफ ध्यान से देखा 27 साल की वो लड़की बेहद खूबसूरत थी, हल्का सावला रंग, बड़ी बड़ी काली आंखें मानो जैसे हर पल कुछ न कुछ कह रही हो, चेहरे पर हरदम रहने वाली खिलखिलाती मुस्कुराहट जिसे देखकर कोई रोता हुआ बच्चा भी शांत हो जाए, माथे के बीचों बीच इक छोटी सी काली बिंदी अपनी ओर ध्यान खींचे हुई थी। वह एक जिंदादिल लड़की थी उसके चेहरे पर दूर-दूर तक कोई शिकन भी नहीं थी मानो उसे इस दुनिया की कोई परवाह ही नहीं।  पूरे आत्मविश्वास से भरी हुई वह लड़की  फिर बोली आपका नाम क्या है? 

 शायद दूसरी या तीसरी बार पूछ रही थी उसके सवाल सुनते ही लड़का अपनी ख्याली दुनिया से ट्रेन की d2 कोच मैं नीचे की बर्थ सीट नंबर 36 पर वापस आया। 

 मैं रजत, वो बोला और फिर पहले की तरह शांत होकर खिड़की से बाहर देखने लगा। 

 रजत… वृंदा ने दोहराया।

जब मन कहीं भटक कर परेशान हो रहा हो तो किसी की जु़बान से अपना नाम सुनना कितना सुकून देता है।  वही पल भर का सुकून रजत को भी मिला था। जैसे सालों बाद किसी ने उसका नाम पुकारा हो।

 हां, रजत बोला।

तब रजत ने ध्यान दिया कि सामने वाली बर्थ पर एक अधेड़ व्यक्ति अपनी पत्नी के साथ बैठे थे। उनके साथ उनका बेटा बहू और 2 महीने का पोता भी था।

आप इतने परेशान से क्यों हैं वृंदा की आवाज़ ने रजत का ध्यान खींचा।

 कुछ नहीं वो मुझे ट्रेन से सफ़र करना पसंद नहीं है बस इसलिए शायद तुमको लगा। बाबा की  जिद थी कि इस बार ट्रेन से जाऊं वरना मैं तो हमेशा प्लेन से ही सफ़र करना ज्यादा पसंद करता हूं।

 रजत ने बहुत ही संजीदगी से जवाब दिया।

अगर आप बुरा ना माने तो मैं कुछ बोलूं वृंदा ने पूछा और बिना रजत के किसी जवाब का इंतजार किए बताने लगी।

बोली, मुझे ट्रेन का सफ़र बहुत पसंद है, प्लेन से तो सिर्फ बादलों का गुबार दिखता है। लेकिन ट्रेन की खिड़की जो दृश्य दिखाती है उन्हें आप जी भी सकते हैं। उसने बताया कि पटरी पर सरपट दौड़ती हुई ट्रेन की खिड़की आपको ऐसा भ्रमण करा देती है जो हवाई जहाज में कहीं पीछे छूट जाता है।

 रजत अब बड़े गौर से सुन रहा था, जिस अपनेपन से वृंदा बता रही थी उस अपनेपन को देखकर रजत थोड़ा भावुक हो गया और उसकी आंखों में नमी तैर गई।  उसने अपनी भावनाओं पर काबू किया और आगे सुनने लगा।

 वृंदा ने अपनी बात को जारी रखते हुए आगे कहा देखो यह पीछे निकलते धान के खेत कितने सुंदर हैं, दूर से पास आते हुए छोटे-छोटे गांव, यहां खेलते हुए छोटे बच्चे ट्रेन को देखकर कितना खुश होते हैं।

हां बेटी सही कह रही हो। सामने बैठे परिवार में से अधेड़ उम्र के व्यक्ति ने कहा – हम भी हमेशा शिमला ट्रेन से ही जाते हैं ट्रेन का जो मजा है हवाई जहाज में कहां इतना कहकर सब मुस्कुरा दिए। वृंदा भी उसी अंदाज में मुस्कुराई। उसकी मुस्कान इतनी प्यारी थी कि उसे देख कर कोई भी पल भर के लिए अपने सारे दुख भूल जाए।

वृंदा ट्रेन के सफ़र की खूबियों को गिना ही रही थी कि एकदम से हवा का एक झोंका आया और उसके आजाद बाल रजत के चेहरे को छू गए  और कुछ पल को वो यूं ही  स्तब्ध रह गया।  वृंदा के बालों की खुशबू ने उसे एक ऐसी याद में धकेल दिया जिस से बाहर आने में उसे काफी वक्त लगा था।  उसका पहला प्यार रिधिमा।

उसे याद आया कि वो रिधिमा को कितना प्यार करता था उसकी एक हंसी के लिए कुछ भी करने को हमेशा तैयार रहता था। हांलाकि वह हमेशा खुलकर तो नहीं कह पाता था क्योंकि वो कम बोलता था और उसे प्यार दिखाना नहीं आता था। हमेशा से ही वो थोड़ा शांत और गंभीर स्वभाव का था। पर रिधिमा को जब भी कहीं घूमना होता या शॉपिंग करनी होती तो रजत हमेशा तैयार रहता था।

इतना प्यार करता था कि वह अपनी मां को भी उसके बारे में बता चुका था। 1 दिन उसने  हिम्मत करके सोचा कि वो रिधिमा से शादी के लिए पूछेगा। उसने ऑफिस से छुट्टी लेली सोचा रिधिमा के घर जाकर उसे सरप्राइस देगा सो पूरी तैयारी के साथ बिना बताए उसके घर पहुंच गया।

 वहां जाकर जो उसने देखा उसकी आंखों से आंसू आ गए। रिधिमा अमित के साथ थी दोनों प्यार में डूबे हुए थे।

 ये देखकर उसकी उम्मीदों की टूटी हुई किरचें उसके सीने में धँसने लगी। जिस लड़की को वह बेपनाह मोहब्बत करता था वह किसी और की बाहों में थी।  रिधिमा ने भी उसे देख लिया  रजत के पूछने पर वह बोली कोई तुम जैसे सो कॉल्ड बोरिंग आदमी से कैसे प्यार कर सकता है?  तुम चले जाओ यहां से। 

उसने रिधिमा के लिए जो अंगूठी  खरीदी थी उसकी पेंट की जेब में ही घर वापस आ गई। उस दिन के बाद से रजत का प्यार से विश्वास उठ चुका था।

आप सुन रहे हैं ना वृंदा बोली तो रजत अपने अतीत के उस कड़वे सच से बाहर आया।  हां सुन रहा हूं बोलो। 

टिकट टिकट कहता हुआ टीटी आया और टिकट दिखाने को कहा तो सब ने बारी-बारी से अपना टिकट दिखाया।  टीटी से टिकट वापस लेने के बाद रजत ने  सीट पर ही रख दिया उसका मन उदास था।  कालका स्टेशन आने में अभी डेढ़ घंटा बचा था फिर भी बाहर पहाड़ दिखने  लगे थे। 

अचानक मौसम बदला और बाहर बारिश शुरू हो गई रजत को बारिश कुछ खास पसंद नहीं तभी उसने वृंदा की तरफ देखा वो किसी बच्चे की तरह खिड़की से हाथ बाहर निकालकर बारिश की बूंदों को अपनी हथेली से छू रही थी । वो ऐसे खुश हो रही थी जैसे मानो उसे सब कुछ मिल गया हो। उसने बड़ी मासूमियत के साथ कहा देखो बाहर बारिश हो रही है और फिर बारिश की बूँदों को हथेली पर इकट्ठा करने लगी।

 चाय चाय करता हुआ एक आदमी आया और बोला हां साहब चाय ? चाय का नाम सुनते वृंदा बोली चाय पियोगे ? नहीं मैं चाय नहीं पीता तुम ले लो । रजत ने कहा तो बाकी सब ने चाय ले ली। एक हाथ से चाय का कप पकडी़ हुई थी और दूसरे हाथ से बारिश से खेल रही थी।

 चाय पीते हुए बुजुर्ग व्यक्ति ने हम दोनों से परिचय पूछा। मैं एक न्यूज़ चैनल कंपनी में जर्नलिस्ट हूं रजत ने बताया। एक मीटिंग के लिए कालका जा रहा हूं। 

रजत की बात पूरी होने के बाद वृंदा बोली मैं फैशन डिज़ाइनर हूं एक फैशन कंपनी के लिए कॉस्ट्यूम डिजाइन करती हूं इतना बोलने के बाद उसने अपने बैग से अपनी ड्राइंग बुक निकाली और खुद की बनाई हुई डिजाइन दिखाने लगी सब ने काफी तारीफ की डिजाइन भी बहुत उम्दा थीं। उसने बताया कि वह सोलन जा रही है अपने दादा दादी से मिलने वहां उसका गांव है।

रजत बहुत देर से खामोश था शायद  वृंदा उसकी खामोशी भांप गई थी उसने पूछा आप बुरा ना माने तो मैं कुछ पूछ सकती हूं आपके बारे में ? रजत चुप रहा। क्या कुछ गलत हुआ है आपके साथ? उसने बहुत अपनेपन के साथ पूछा था। रजत बोला नहीं मैं ठीक हूं। इस बार शायद  वृंदा को थोड़ा बुरा लगा था ठीक है नहीं बताना तो मत बताइए। सही बात है मैं कौन होती हूं? अब रजत से रहा ना गया और उसने रिधिमा के बारे में बताया उसने बताया कि उस कैसे उसे प्यार में धोखा मिला।

वृंदा ने बड़ी सहजता के साथ  कहा हमेशा वक्त ही गलत नहीं होता कभी-कभी वह इंसान भी गलत होता है जिससे हम प्यार करते हैं ऐसे लोगों को सच्चे प्यार की कदर नहीं होती आप परेशान मत होइए आपको आपका प्यार मिल जाएगा। कालका बस 20 मिनट ही दूर था।

 चायवाला फिर आ गया बोला हां साहब चाय वृंदा बोली ये चाय नहीं पीते ।नहीं नहीं कभी-कभी पी लेता हूं रजत बोला और हंस दिया । सालों बाद खुलकर हंसा था एक बोझ  जो उसके मन से हल्का हो गया। दोनों ने चाय ले ली। अब वह चाहता था कि ये सफ़र बस ऐसे ही चलता रहे ऐसे ही वो वृंदा के साथ उस ट्रेन के d2 कोच की सीट नंबर 36 पर यूं ही उसके साथ बैठा रहे। 

कालका स्टेशन खिड़की से दिखने लगा था वह चाहता था कि वृंदा उसे रोक ले । लेकिन शायद किस्मत को कुछ और ही मंजूर था स्टेशन आया और उसे उतरना पड़ा। वह लड़की जा चुकी थी जिसने उसका दुनिया देखने का नजरिया ही बदल दिया था, फिर से उसको प्यार पर यकीन दिलाया था ।जिसकी वजह से इतने दिन बाद उसके चेहरे पर मुस्कुराहट आई थी। वह उसे और उसकी बातों को याद कर रहा था, उसके बचपने को दोबारा देखना चाहता था। उस ट्रेन का सफ़र दोबारा जीना चाहता था।

 वह दिन किसी तरह बीत गया। रजत ऑफिस से लौट रहा था तभी उसका फोन बीप बीप करके दो बार बजा किसी अनजान नंबर से मैसेज था शायद-

 सोलन  घूमना चाहेंगे जर्नलिस्ट साहब, यहां की पहाड़ियां बहुत खूबसूरत हैं।    ~ वृंदा

S.m.s. पढ़कर उसकी खुशी का ठिकाना नहीं था। जब घर आकर उसने अपना सामान देखा तो उसमें टिकट नहीं था ।

सीट नंबर 36 पर ही छूट गया था शायद।

इस 6 घंटे के सफ़र में हमसफ़र मिल गया था शायद।