आजमगढ़ में सपा और भाजपा के बीच ‘गढ़’ बचाने की चुनौती : Loksabha Election 2019

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महर्षि दुर्वासा, दत्तात्रेय व चंद्रमा ऋषि की तपोस्थली और महापंडित राहुल सांकृत्यायन, अल्लामा शिब्ली नोमानी, कवि

अयोध्या सिंह उपाध्याय हरिऔध, कैफी आजमी जैसी विभूतियों की धरती आजमगढ़ में इस बार कहने के लिए तो

विकास और राष्ट्रवाद का मुद्दा हावी है लेकिन प्रमुख पार्टियों ने प्रत्याशी उतारने से पहले यहां के जातीय समीकरणों

को भी ठीक से समझा है।

जिले से रिश्ते भले पुराने हों लेकिन प्रत्याशी नए हैं। कांग्रेस ने यहां प्रत्याशी नहीं उतारा है।

भाजपा को यहां खोने के लिए कुछ नहीं है तो सपा के सामने अपने गढ़ को बचाने की चुनौती है।

हालांकि इन दोनों के अलावा यहां 13 प्रत्याशी और मैदान में डटे हैं।

सब अपने अपने ढंग से वोटरों को लुभाने में लगे हैं।

गर्मी की तपिश जैसे-जैसे बढ़ रही है वैसे-वैसे आजमगढ़ लोकसभा सीट पर सियासी पारा भी चढ़ता जा रहा है।

यहां कांग्रेस मैदान में नहीं है।

ऐसे में सीधा मुकाबला सपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव और भाजपा के भोजपुरी अभिनेता दिनेश लाल यादव

उर्फ ‘निरहुआ’ के बीच ही है।

इससे अब एक तस्वीर तो साफ हो गई है कि मत बिखरेंगे नहीं।

सपा-बसपा गठबंधन के चलते यहां एमवाई समीकरण भारी पड़ रहा है।

संभवत: इसी के मद्देनजर भाजपा ने यहां से यादव प्रत्याशी निरहुआ को उतार कर वाई फैक्टर में सेंधमारी

की कोशिश में है।

लब्बोलुआब यह कि भाजपा को यहां खोने को कुछ नहीं है तो वहीं सपा अपने गढ़ को हर हाल बचाने की जुगत में है।

मतदाताओं के बीच दोनों दलों के दिग्गज पहुंच रहे हैं।

पार्टी मुखिया होने के कारण अखिलेश जहां अपने दल के प्रत्याशियों का प्रचार पूरे प्रदेश में कर रहे हैं तो

यहां उनके विश्वस्त और दिग्गज सपाइयों की पूरी फैज मैदान में उतर चुकी है।

दूसरी ओर भाजपा प्रत्याशी निरहुआ पार्टी के नामचीन चेहरों के साथ

गांव-गांव जाकर प्रचार कर रहे हैं।

वहीं समाजवादी पार्टी को अपने कार्यकाल के दौरान आजमगढ़ में कराए गए विकास कार्यों पर भरोसा है।

कार्यकर्ता जनता के बीच जाकर यही समझा भी रहे हैं।

बता रहे हैं कि मूलभूत सुविधाएं सपा सरकार के समय बेहतर थी।

भाजपा सरकार में सबकुछ बेदम हो चुका है।

सपा राष्ट्रीय महासचिव व वरिष्ठ नेता बलराम यादव कहते हैं कि आज यहां जो भी कुछ है वह सब तत्कालीन

अखिलेश सरकार की देन हैं।

आगे यह भी जोड़ते हैं कि यहां भाजपा का जीतना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन है।