कविता:ए बुरे वक़्त अब तु जा! के लेखक है :- निशान्त त्यागी “सविते

0
44

कविता
ए बुरे वक़्त अब तु जा!

बस चोटो से आहत है दिल
सपने कहाँ संजोंनें को है ।
ए बुरे वक्त अब तु जा ,
मेरी आँखें रोने को हैं ।।

धुमिल है पहचान मेरी वो ,
जिस पर गर्व मुझे होता था ।
रही नहीं है सान मेरी वो ,
जिस पर गर्व मुझे होता था ।
दुग्ध पात्र यहाँ समय बदलते ,
मदिरा प्यालो में बदल गये है ।
बस मुट्ठी भर यहाँ दरिंदे ,
रखवालो में बदल गये है ।
यूँ पूत अनेकों माताओ के ,
कंकालों में बदल गये है ।
मेरे आँगन में दुहिता ,
स्वंम की लज्जा खोने को है ।।
ए बुरे ——————।।

एक द्रोण ने शिक्षा के बदले ,
स्वार्थ सिद्ध करना जाना था ।
इसके प्रतिफल में निश्चित ,
महाभारत का हो जाना था ।
चाह कर भी मैं रोक सकी ना ,
लहुओ की बोझारो को ।
ना झिझके ना रोक सके ,
अपनो पर चलती तलवारो को ।
सीता की श्री लंका में ,
गीली आँख हुई ।
इसके प्रतिफल में देखो ,
श्री लंका जलकर राख हुई ।
आज विद्यालय द्रोणो से ,
कुर्सी रावण से मुक्त नही होती ।
अत्याचार सहती अबलों की ,
आँखे सुसक नही होती ।।
फिर से कोई रक्तिली क्रान्ति ,
दामन मेरा भिगोने को है ।।
ए बुरे—————–।।
(लेखक)
निशान्त त्यागी “सविते