‘कहते हैं रेत पर कुछ नहीं टिकता, मगर मेरी जिंदगी की इमारत इसी रेत पर तामीर हुई’ ..

0
1
SAND ARTIST

सुदर्शन पटनायक किसी परिचय के मोहताज नहीं हैं। मृदुभाषी और साथ ही अल्पभाषी इस कलाकार की रेत
द्वारा निर्मित कृतियां उनका परिचय देती रही हैं। आपने भले उनको न देखा हो, पर उनकी कलाकृतियों को
अखबारों में और टेलीविजन के पर्दे पर जरूर देखा होगा।

महज 8-9 वर्ष की उम्र से रेत से उनका जुड़ाव हुआ। कहते हैैं कि रेत पर कुछ भी टिकता नहीं, लेकिन
उनकी कामयाबी की पुख्ता इमारत रेत पर ही बनी है। इस कामयाबी की प्रेरक दास्तान लगातार उनकी
कृतियों के जरिए लिखी जा रही हैं। उनकी कहानी ऐसी कहानी है, जो महापुरुषों, नायकों की तरह
महागाथा है।

यह गाथा वही है, जिसमें यह बताया गया है कि असल नायक वही है, जिसमें परिस्थितियों को अपने मुताबिक
ढालने का हुनर और साहस भी होता है। जब उन्होंने होश संभाला था, उनके पिता मां और चार बच्चों को
अकेला छोड़कर चले गए थे। पिता ने दूसरी शादी कर ली। दादी के पेंशन पर घर चलाना मुश्किल था, इसलिए
सुदर्शन पड़ोस के घरों में घरेलू नौकर बनकर रहे। भले ही पढ़-लिख नहीं सके, लेकिन आज इस नायक को
दुनिया सलाम कर रही है और श्रेष्ठ सम्मान से नवाज रही है।

अभी वे महज 41 साल के हैं, लेकिन दुनिया भर की 50 से अधिक सैंड आर्ट प्रतियोगिता में उन्होंने न केवल
शिरकत किया है, बल्कि अधिकांश में अव्वल भी रहे हैं। उनके नाम देश का पद्मश्री है ही, अनेक लिम्का बुक
रिकॉड्र्स भी हैं। उनके मुताबिक, ‘यह अक्सर कहा जाता है कि रेत का कोई वजूद नहीं। आप जो कल्पना
करते हैं, रेत पर उसकी इमारत खड़ी करते हैं। उसे कब आंधी आए और उड़ा ले जाए। पता नहीं, कब तेज
लहरों के आगोश में वह खो जाए, इसका ठिकाना नहीं। पर जिंदगी का भी तो यही हाल है, आपकी जिंदगी
भी तो अनिश्चित है।