खाली स्टेडियमों में भी IPL मैच कराना आसान नहीं, इतनी चुनौतियों से कैसे पार पाएगी BCCI

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कोरोना वायरस के कहर के बीच आइपीएल को लेकर कई विकल्पों पर विचार किया जा रहा है। इनमें से एक है खाली स्टेडियमों में मैचों का आयोजन। आइपीएल की गवर्निंग काउंसिल आइपीएल चौकों-छक्कों का खेल है। तकरीबन हर ओवर में ही गेंद स्टेडियम की ऊंची-ऊंची गैलरियों की हवाई यात्रा करती है। जो गेंद जमीनी फासला तय कर बाउंड्री लाइन के पार जाती हैं, उन्हें ग्राउंड पर लौटाने के लिए बॉल ब्वाय होते हैं, लेकिन ऊंची गैलरियों में वहां बैठे दर्शक ही बॉल ब्वाय की भूमिका निभाते हैं। उन्हीं के हाथों से गेंद वापस मैदान पर पहुंचती हैं।

ऐसे में अगर गैलरियां खाली होंगी तो गेंद मैदान पर कैसे लौटेगी? वहीं कैमरों से गैलरियों में हर जगह गेंद पर नजर रख पाना भी संभव नहीं है, खासकर गेंद के कुर्सियों के नीचे कहीं चले जाने पर। इस मामले में भी वहां बैठे दर्शक ही बॉल ट्रैकर का काम करते हैं। खाली स्टेडियम होने पर आइपीएल प्रबंधन को इन भावी चुनौतियों के लिए अच्छी-खासी तैयारी करनी पड़ेगी क्योंकि सही व्यवस्था नहीं होने पर काफी समय बर्बाद हो सकता है, जिससे मैच की अवधि बढ़ जाएगी।

बंगाल क्रिकेट टीम के पूर्व कप्तान संबरन बनर्जी ने कहा कि दर्शकों के बिना आइपीएल का आयोजन संभव तो नहीं लग रहा लेकिन अगर सच में ऐसा होता है तो हर स्टेडियम में बॉल ब्वाय की बहुत बड़ी टीम की जरूरत पड़ेगी, जिन्हें बाउंड्री लाइन के साथ-साथ गैलरियों में भी तैनात करना पड़ेगा। जहां तक मुझे जानकारी है,
एक मैच के लिए मैदान पर 20 से 22 बॉल ब्वाय लगते हैं। कोलकाता में होने वाले आइपीएल
मैचों के लिए मेरी क्रिकेट
अकादमी से हर साल पांच-छह प्रशिक्षु बतौर बॉल ब्वाय लिए जाते हैं।

ईडन गार्डेंस स्टेडियम के क्यूरेटर सुजन मुखर्जी ने कहा कि मैच के दौरान बाउंड्री लाइन के पास बैठे
हमारे ग्राउंड स्टाफ भी बॉल ब्वाय की भूमिका निभाते हैं। अगर इस बार हमें ईडन की गैलरियों में
तैनात रहकर गेंद पकड़कर ग्राउंड में फेंकने का अतिरिक्त काम सौंपा गया तो
हम इसके लिए भी तैयार रहेंगे।
हालांकि यह मौसम के मिजाज पर निर्भर करेगा क्योंकि बारिश की संभावना होने पर हम अपने स्टाफ को
दूसरे काम में नहीं लगा पाएंगे।

मैदान पर बॉल ब्वॉय का काम भले आसान दिखता है लेकिन ये काफी मुश्किल भरा है।
बाल ब्वॉय का चयन आम तौर पर राज्य क्रिकेट संघों से संबद्ध क्रिकेट अकादमियों से होता है।
बॉल ब्वॉय के लिए ऐसे प्रशिक्षु क्रिकेटरों को चुना जाता है, जो शारीरिक तौर पर काफी चुस्त होते हैं, जिनकी उपस्थित बुद्धि काफी अच्छी होती है और जिन्हें क्रिकेट की अच्छी समझ होती है। विभिन्न क्रिकेट अकादमी में अलग से यह हुनर भी सिखाया जाता है। मास्टर ब्लास्टर सचिन तेंदुलकर भी 13 साल की उम्र में बॉल ब्वाय की भूमिका निभा चुके हैं।