‘द सरकारी मुसलमान’ : मोदी सरकार साथ देती तो 24 घंटे पहले रुक सकते थे गुजरात के दंगे

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अलीगढ़ (जेएनएन)। गुजरात में नरेंद्र मोदी की सरकार चाहती तो 24 घंटे पहले दंगे रुक सकते थे। गुजरात सरकार ने सेना को मजिस्ट्रेट, पुलिस व वाहन तक उपलब्ध नहीं कराए थे। यह दावा किया गया है अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के कुलपति ले. जनरल जमीरउद्दीन शाह (सेवानिवृत्त) की आटोबायोग्राफी में। शाह ने पुस्तक में नया दावा यह किया है कि गुजरात दंगों पर काबू पाने गई सेना को सुविधाएं 24 घंटे बाद उपलब्ध कराई थीं। मदद पहले मिल जाती तो दंगे पर नियंत्रण 48 घंटे की बजाय 24 घंटे में हो जाता। उस समय नरेंद्र मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री थे।

13 अक्टूबर को पूर्व उपराष्ट्रपति करेंगे विमोचन
जमीर उद्दीन शाह की आटोबायोग्राफी का 13 अक्टूबर को पूर्व उप राष्ट्रपति हामिद अंसारी दिल्ली में विमोचन करेंगे। इसे लेकर एएमयू में भी उत्सुकता है। पुस्तक को लेकर शाह का एक टीवी चैनल को दिया गया इंटरव्यू भी चर्चाओं में है।

कारसेवकों को जिंदा जलाने पर भड़का था दंगा
पुस्तक में शाह ने गुजरात दंगों का विस्तार से जिक्र किया है। लिखा है कि 27 फरवरी 2002 को गोधरा रेलवे स्टेशन पर साबरमती एक्सप्रेस में 59 कारसेवकों को आग के हवाले करने के बाद दंगा भड़क गया था। सेना को मदद के लिए बुलाया गया था। सेना की टुकड़ी का ले.जनरल जमीरउद्दीन शाह नेतृत्व कर रहे थे। 28 फरवरी को सेना अहमदाबाद हवाई स्टेशन पर पहुंच गई थी। यहां से हमें लोकल पुलिस, प्रशासनिक अफसर व गाडिय़ों की जरूरत थी। 24 घंटे बाद ये मदद मिली। यह भी देखने को मिला कि लोकल पुलिस एक पक्ष की तरफदारी कर रही थी। ऐसा गुजरात ही नहीं, देश में जहां भी दंगे होते हैं पुलिस तरफदारी ही करती है।

जीवन के हर पहलु को किया शामिल
सेना ऐसा नहीं करती।  एसआइटी ने अपनी रिपोर्ट में कहा था कि अहमदाबाद पहुंचने के अगले दिन ही मदद मिली गई थी, यह सही नहीं है। एसआटी के किसी अधिकारी ने मुझसे मशविरा ही नहीं किया। इतने दिन बाद गुजरात दंगों की बात क्यों? इस पर शाह का कहना था कि मैंने किताब में अपने जीवन से जुड़े हर पहलू को शामिल किया है। गुजरात दंगों में ड्यूटी भी एक हिस्सा है। इसके पीछे कोई राजनीतिक हित नहीं है।

कांग्रेस-भाजपा के राज में एएमयू को मिला कम बजट 
शाह ने तमाम अनुभवों को साझा करने के साथ यह भी लिखा है कि कुलपति रहते हुए कांग्रेस और भाजपा की केंद्र सरकार में काम किया। दोनों सरकारों में एएमयू को बीएचयू व जामिया मिलिया से कम ग्रांट मिली। मैंने ये मुद्दा उठाया भी, पर सरकार समाधान नहीं कर पाई। शाह ने एएमयू को नंबर वन बनाने की कोशिशों का जिक्र करते हुए लिखा है कि उन्होंने रिसर्च व अनुशासन अधिक जोर दिया।