नीलकंठ

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    अमृत पाने की लालसा में जब देव और दानव दोनों समुद्र मंथन में लगे हुए थे तब अमृत से पहले कालकूट नामक हलाहल निकला, विष इतना भयंकर था कि उसकी ज्वाला से दसों दिशाएं जलने लगी थी।

    सब देव दानव गंधर्व ऋषि मनुष्य और यक्ष त्राहि-त्राहि करने लगे संसार में हाहाकार मच उठा था। अब सृष्टि का विनाश तय था क्योंकि इस हलाहल का कोई तोड़ ही नहीं था तब सब ने महादेव से विनती की।
    उपरांत महाकाल ने विषपान करने का निश्चय किया क्योंकि यही एकमात्र तरीका था जिससे सृष्टि का विनाश टल सकता था जब महादेव कालकूट हलाहल को ग्रहण कर रहे थे तब अधभर में उनका शरीर नीला पड़ने लगा था विश अपना असर दिखाने लगा था महादेव रुक ना जाए इस भय से सबने देवी आदिशक्ति को याद किया।
    देवी आदिशक्ति ने अपने हाथों से महादेव का गला दबा लिया जिससे विश पेट में ना जाए उन्होंने विष को कंठ में ही रोक दिया जिससे वह नीलकंठ कहलाए विषपान पूरा होने के बाद सब ने राहत की सांस ली।
     उसके बाद महादेव आराम करने के लिए सालों तक योग में चले गए।