बंद कमरे में एक की मौत दूसरा था जिंदा, आरुषि की तरह यह मर्डर मिस्ट्री भी करती है हैरान ….

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मई, 2008 में देश-दुनिया को हिला देने वाले आरुषि मर्डर मिस्ट्री 11 साल बाद भी अनसुलझी है।

बेशक आरुषि-हमेराज मर्डर देश के सबसे बड़े अनसुलझे मामलों में से है,लेकिन एनसीआर का ये ये ऐसा पहला मामला

नहीं है, बल्कि नोएडा से सटे गाजियाबाद में सार्थक हत्याकांड को भी पूरे 10 साल बाद भी अपने अंजाम तक नहीं पहुंचा है।

120 महीने बाद भी सार्थक हत्याकांड में पुलिस वहीं खड़ी है, जहां वह घटना वाले दिन यानी 5 फरवरी 2009 को खड़ी है,

जब घर में मासूम सार्थक मृत मिला था, जबकि शव के पास घायल अवस्था में उसकी मां दीप्ति पड़ी थी।

गाजियाबाद ही नहीं, देश की कुछ चुनिंदा मर्डर सबसे बड़ी मर्डर मिस्ट्री शुमार हो चुके सार्थक हत्याकांड को इसी साल

5 फरवरी को 10 वर्ष वर्ष हो गए, लेकिन सवाल बाकी है कि आखिरकार साढ़े चार वर्ष के मासूम का हत्यारा कौन है?

इस मामले में जब भी पुलिस अफसरों से पूछा जाता है कि तो उनका रटारटाया जवाब होता है कि सार्थक का हत्यारा

एक न दिन गिरफ्त में होगा। कब? इसका जवाब किसी के पास नहीं है।घटनाक्रम के मुताबिक, 5 फरवरी, 2009 को

राजनगर के सेक्टर-8 के अपार्टमेंट के फर्स्ट फ्लोर में रहने वाले डॉक्टर राजेश चावला रोजाना की तरह ही शाम तकरीबन

4 बजे मुकंदनगर स्थित अपने क्लीनिक के लिए निकले। इसके बाद वह मरीजों को देखने में व्यस्त हो गए। करीब 6 बजे

घर पहुंची घरेलू सहायिका ने उनके फ्लैट का दरवाजा खटखटाया। इस बीच अंदर से किसी की आवाज न आपने पर

अनहोनी के डर से उसने गेट पर तैनात गार्ड को इस बात की जानकारी दी।

इस पर गार्ड ओमबीर ने खिड़की से अंदर झांका तो अंदर कमरे में डॉक्टर राजेश की पत्नी डॉ. दीप्ति चावला खून से

लथपथ पड़ी थी और पास ही उनका बेटा सार्थक बुरी तरह घायल पड़ा था।

गार्ड ने ही डॉक्टर राजेश को इस घटना की जानकारी दी।

फिर पुलिस भी घटनास्थल पर पहुंची और कमरे का लॉक तोड़कर घर पहुंची।

अंदर कमरे में सार्थक का सिर कुचला हुआ था।

उसके पास ही चाकू, हथौड़ा, पेचकस समेत कई अन्य सामान बिखरा पड़ा था।

वहीं, पास ही बेहोश पड़ी डॉक्टर दीप्ति के भी दोनों हाथों की नसेें कटी थीं और शरीर के कई हिस्सों

में चोट के गंभीर निशान थे।

आरुषि मर्डर की तरह ही फ्लैट का लॉक खोलकर कमरे में दाखिल हुई पुलिस की भूमिका शुरू से अजीब तरह की रही।

पुलिस टीम पहुंची तो, लेकिन फिंगर प्रिंट उठाने और अन्य तकनीकी जांच में चुक कर गए।

तत्कालीन एसएसपी अखिल कुमार और एसपी सिटी अनंतदेव ने दावा किया था कि दीप्ति इस केस की मुख्य गवाह हैं

उनके बयान से केस खुल जाएगा।

हालांकि, दीप्ति 8 फरवरी को होश में आई और पुलिस ने उनके बयान भी लिए।

तत्कालीन पुलिस अधिकारियों की मानें तो पति राजेश की तरह ही पेशे से डॉक्टर दीप्ति ने बताया था कि

एक काला साया सा आया था, जिसने उसके बेटे को मारा और उसी ने उसे भी घायल किया। काफी समय

तक जांच सार्थक की मां दीप्ति के इर्दगिर्द घूमती रही, लेकिन अब 10 साल बाद भी जांच बेनतीजा है।

यहां पर बता दें कि दिल्ली से सटे गाजियाबाद में हुआ सार्थक हत्याकांड भी आरुषि जैसा है और इन दोनों

हत्याकांड में काफी समानताएं हैं।

सबसे बड़ी समानता तो यही है कि आरुषि और सार्थक हत्याकांड को 10 साल से अधिक हो चुके हैं,

लेकिन दोनों ही अनसुलझे हैं। बता दें कि आरुषि तलवार की हत्या 15-16 मई, 2008 की रात हुई थी,

जबकि सार्थक की मौत 5 फरवरी, 2009 को दिन में ही हुई थी।

5 फरवरी, 2009 को राजनगर में हुए साढ़े चार साल के मासूम सार्थक हत्याकांड को आठ साल पूरे हो चुके हैं,

लेकिन यह सवाल अब भी पुलिस को चिढ़ा रहा है कि साढ़े चार साल के उस मासूम को आखिर किसने मारा था,

ठीक आरुषि हत्या की तरह। पुलिस ने भी इस मामले में फाइनल रिपोर्ट लगाकर मान लिया है कि अब इस केस में

वह कुछ नहीं कर सकती है।

घटनाक्रम के मुताबिक, 5 फरवरी, 2009 को दिल्ली से सटे राजनगर में सेक्टर-8 के अपार्टमेंट के फर्स्ट फ्लोर पर

रहने वाले डॉ. राजेश चावला दोपहर में खाना खाने के बाद शाम करीब 4 बजे मुकुंदनगर स्थित अपने क्लीनिक के

लिए निकले थे।