बदरुद्दीन और बर्थवाल के बीच फंसी बदरीनाथ की 100 साल पुरानी आरती, जानें क्या है विवाद …

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जैसे-जैसे सूरज ढलता जाता है और घंटियां बजने लगती हैं, एक उथल-पुथल सी शुरु हो जाती है, तीर्थयात्री उत्तराखंड के

चार धामों में से एक बदरीनाथ में कतारबद्ध हो जाते हैं।

यहां होने वाली आरती का नजारा देखने वाला होता है। हाथों में बड़े-बड़े अग्नी प्रज्वलित दिये लेकर पुजारी पवित्र मंत्रों के

उचारण करते हैं।

बदरीनाथ में करोड़ों हिंदुओं की आस्था है।

यहां की आरती का भी बड़ा महत्व है, लेकिन इस बार प्रार्थना करने के साथ ही भक्तों के मन में एक प्रश्न भी होगा कि

आरती ‘पवन मंडल सुगंध शीतल’ किसने लिखी थी।

दरअसल, अभी तक माना जाता है कि करीबन 150 साल पहले इस आरती की रचना चमोली जिले के नदंप्रयाग के

रहने वाले मुस्लिम बदरुद्दीन ने की थी।

‘पवन मंद सुगंध शीतल हेम मंदिर शोभितम् ।
निकट गंगा बहत निर्मल बदरीनाथ विश्वंभरम, श्री बदरीनाथ विश्वंभरम ।।
शेष सुमरिन करत निशदिन धरत ध्यान महेश्वरम
वेद ब्रहमा करत स्तुति श्री बदरीनाथ विश्वंभरम, श्री बदरीनाथ विश्वंभरम।।

भारतीय जनता पार्टी सरकार ने इसके रचयिता का ऐलान कर नई बहस छेड़ दी है।

सरकार का कहना है कि एक स्थानीय लेखक धान सिंह बर्थवाल ने यह आरती लिखी है।

जबकि सालों से यह मान्यता है कि चमोली में नंदप्रयाग के एक पोस्टमास्टर फखरुद्दीन सिद्दीकी ने यह आरती लिखी थी।

सिद्दीकी भगवान बदरी के भक्त थे और लोग बाद में उन्हें ‘बदरुद्दीन’ बुलाने लगे थे।

आरती की पांड़लिपि की कार्बन डेटिंग के परिणाम से साबित हो गया है कि यह वर्ष 1775 के आसपास की है और धन

सिंह इसी दौर के हैं, जबकि बदरुद्दीन उन्नीसवीं सदी के उत्तरा‌र्द्ध के हैं।

धन सिंह के वंशजों ने पांडुलिपि की प्रति मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत को भेंट भी की है।

इस अवसर पर मुख्यमंत्री ने कहा कि इससे यह साबित हुआ है कि हमारे पूर्वज उस वक्त भी जागरुक थे।

स्व. धन सिंह के वंशजों ने इतनी पुरातन सम्पदा को संजोकर रखा, यह दूर दृष्टि का परिचायक है।

उत्तराखंड अंतरिक्ष उपयोग केंद्र (यूसैक) के निदेशक डॉ. एमपीएस बिष्ट ने बताया कि पिछले साल विजराणा गांव के

रहने वाले स्व. धन सिंह के परपोते महेंद्र सिंह ने सचिव पर्यटन दिलीप जावलकर को पांडुलिपि सौंपकर दावा किया था

कि आरती उनके परदादा ने लिखी है।