भगवान श्रीराम के विश्राम और भोलेनाथ के नृत्य का साक्षी है गोरखगिरि पर्वत ..

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आइए आज आपको रूबरू कराते हैं महोबा की पौराणिक-आध्यात्मिक महत्ता से, जिसमें विश्व के पर्यटकों को
आकर्षित करने की क्षमता है। मर्यादा पुरुषोत्तम प्रभु श्रीराम, माता जानकी और लक्ष्मण के विश्राम के साथ ही
गजासुर के अंत के बाद भूतभावन भोलेनाथ के नृत्य का साक्षी रहा महोबा पौराणिक गोरखगिरि पर्वत सहित
विश्वस्तरीय स्मृतियों-किवंदतियां सहेजे है।

लोगों की अगाध श्रद्धा का केंद्र है गोरखगिरि पर्वत। कहते हैं कि यहां त्रेता युग में वनवास काल के दौरान
मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम, माता सीता व लक्ष्मण ने कुछ समय यहां बिताकर इस भूमि को पवित्र
किया। गुरु गोरखनाथ एवं उनके सातवें शिष्य दीपकनाथ के तप ने इस पहाड़ को तेज प्रदान किया।

11 शताब्दी में चंदेल शासक नान्नुक ने इन महत्ताओं के बारे में जाना तो गोरखगिरि पर्वत के नीचे भगवान शिव
की तांडव करती महाकाल रूपी सिद्ध प्रतिमा स्थापित कराई। यह शिवतांडव मंदिर लोगों की श्रद्धा का केंद्र है। इतिहासकार बताते हैं कि भगवान शिव ने गजांतक नामक असुर का वध करने के बाद यहां नृत्य किया था, उसे
शिवतांडव कहा गया।

इसपर चंदेल शासक नान्नुक ने ऐतिहासिक मदन सागर सरोवर के पश्चिम में गोरखगिरि पर्वत की उत्तर पाद
भूमि में शिला (ग्रेनाइट पत्थर) पर भगवान भोलेनाथ की महाकाल की मुद्रा में तांडव नृत्य करती दस भुजी
प्रतिमा का निर्माण कराया था। यह मूर्ति उत्तर भारत में अपने किस्म की अनोखी है। यह भव्य प्रतिमा एक
चट्टान पर उत्कीर्ण की गई है। इसका वर्णन कर्मपुराण में भी मिलता है। इतिहासकारों के मुताबिक ऐसी
प्रतिमा दक्षिण भारत में ऐलोरा, हेलविका तथा दारापुरम में भी है।