भारतीय राजनीति से अपने अंत की तरफ बढ़ रहा वंशवाद ….

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2019 का लोकसभा चुनाव परिणाम इस रूप में ऐतिहासिक है कि भारतीय जनता ने लगभग 48 साल बाद पूर्ण बहुमत की

सरकार को दोबारा पूर्ण बहुमत से दिल्ली के सिंहासन पर बिठाया।

यह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व कौशल पर जनता की पूर्ण आस्था और 2014 के चुनाव के विपरीत एक सकारात्मक वोट है।

अन्य चीजों के अलावा इस चुनाव का एक महत्वपूर्ण संदेश भारतीय राजनीति में एक तरह से परिवारवाद की राजनीति के अंत

की घोषणा भी है। जीत के बाद अपने विजय-भाषण में मोदी जब अपने संकल्प को दोहराते हैं कि मैं अपने लिए कभी कुछ

नहीं करूंगा तो अपने को इसी परिवारवाद से अलग करते हैं। यहां ‘अपने लिए’ का अर्थ स्वयं मोदी तो हैं ही,

साथ ही इसमें उनका परिवार-वंश भी शामिल है।

लोकतांत्रिक व्यवस्था राजतंत्र या तानाशाही से इस रूप में भिन्न होती है कि राजतंत्र में एक ही परिवार-वंश के लोगों

का राज पीढ़ी दर पीढ़ी चलता रहता है, जबकि लोकतंत्र में जनता लोगों की ताजपोशी करती है।

समाजशास्त्रीय शब्दावली में समझें तो अमेरिकी पॉलिटिकोसोशल एंथ्रोपोलॉजिस्ट राल्फ लिंटन ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक ‘द स्टडी

ऑफ मैन’ में बताया है कि दो तरह की सामाजिक- राजनीतिक परिस्थितियां होती है- प्रदत्त परिस्थिति और अर्जित परिस्थिति।

प्रदत्त परिस्थिति में व्यक्ति को पद, प्राधिकार और प्रतिष्ठा, जन्म, वंश या जाति आदि के आधार पर प्राप्त होते हैं,

न कि गुण-क्षमता और कार्य-निष्पादन के आधार पर तो दूसरी ओर अर्जित परिस्थिति में ये चीजें गुण-क्षमता व

कार्य-निष्पादन के आधार पर ही हासिल होती हैं। राल्फ लिंटन यह भी कहते हैं कि प्रदत्त परिस्थिति बंद समाजों जैसे

कबीला, राजतंत्र और तानाशाही आदि की विशेषता है, जबकि अर्जित परिस्थिति खुले समाजों अर्थात आधुनिक

लोकतांत्रिक व्यवस्था के अनुकूल है।