राजस्‍थान चुनाव 2018: 300 रुपए किलो तक खरीदा गया बीज, 10 रुपए किलो मे बिकी फसल, आखिर क्‍या करे किसान ?

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चुनाव में से पहले राजनैतिक दल किसानों के दर्द पर वायदों का मरहम लगाकर उनका वोट हासिल करते हैं और सत्‍ता हासिल होते ही किसान उनकी प्राथमिकता की सूची से गायब हो जाता है.

नई दिल्‍ली: राजस्‍थान में बाजरे के बीज की कीमत इन दिनों करीब 300 रुपए प्रति किलो है. वहीं बाजार में बाजरे की फसल की खरीद महज दस रुपए प्रति किलो की जाती है. ऐसे में आप राजस्‍थान के किसानों की माली हालत और जिंदगी की जद्दोजहद का अंदाजा लगा सकते हैं. ऐसा नहीं है कि राजस्‍थान में किसानों की बदहाली का यह आलम नया है, बल्कि दशकों से वहां का किसान यही दंश झेल रहा है.

चुनाव में से पहले राजनैतिक दल किसानों के इस दर्द पर वायदों का मरहम लगाकर उनका वोट हासिल करते हैं और सत्‍ता हासिल होते ही किसान उनकी प्राथमिकता की सूची से गायब हो जाता है. राजस्‍थान में यही कहानी दशकों से चली आ रही है और किसान सदा की तरह आज भी ठगा सा महसूस कर रहा है.

किसानों की समस्‍या पर जी-डिजिटल से बातचीत करते हुए किसान महापंचायत के राष्‍ट्रीय अध्‍यक्ष रामपाल जाट ने बताया कि राजस्‍थान विधानसभा चुनाव 2018 के आते ही राजनैतिक दलों को एक बार फिर किसानों की याद आने लगी है. सत्‍ता हासिल करने के लिए एक बार फिर विपक्षी दलों ने किसानों की बदहाली के मुद्दे पर मौजूदा सरकार को घेरना शुरू कर दिया है.

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फसल की स‍ही कीमत नहीं मिलने से किसान पूरी तरह से कर्ज में डूब चुका है. (प्रतीकात्‍मक फोटो)

लागू नहीं हुईं स्‍वामीनाथन सिफारिश
जी-डिजिटल से बातचीत में किसान महापंचायत के राष्‍ट्रीय अध्‍यक्ष रामपाल जाट ने बताया कि किसानों को बदहाली से बाहर लाने के लिए प्रोफेसर एमएस स्‍वामीनाथन के नेतृत्‍व में नेशनल कमीशन ऑफ फार्मर्स का गठन किया गया था. कमीशन ने अपनी सिफारिश में कहा था कि फसल का न्‍यूनतम समर्थन मूल्‍य किसान की लागत का करीब डेढ़ गुना होना चाहिए. आयोग की यह सिफारिश 15 अगस्‍त 2007 से लागू होनी थी. 11 वर्ष से अधिक समय बीत चुका है, लेकिन किसानों के हित वाली इस सिफारिश को अभी तक लागू नहीं किया गया है.

उन्‍होंने बताया कि इन 11 वर्षों में न ही कांग्रेस के नेतृत्‍व वाली यूपीए सरकार ने इन सिफारिशों को कोई तवज्‍जो दी और न ही भाजपा के नेतृत्‍व वाली मौजूदा एनडीए सरकार की प्राथमिकताओं में यह सिफारिशें शामिल हैं. यदि सरकार आयोग की सिर्फ इस एक सिफारिश को लागू कर देती है तो किसानों की 90 फीसदी समस्‍याएं स्‍वत: खत्‍म हो जाएंगी और वह स्‍थाई रूप से ऋण मुक्‍त हो जाएगा.

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किसानों के लिए छलावा है एमएसपी
जी-डिजिटल से बातचीत में किसान महापंचायत के राष्‍ट्रीय अध्‍यक्ष रामपाल जाट ने बताया कि फसल बिक्री के लिए न्‍यूनतम समर्थन मूल्‍य (एमएसपी) का निर्धारण राजनैतिक दलों के लिए राजनीति का एक जरिया बन गया है. सरकार किसानों को बहलाने के लिए न्‍यूनतम समर्थन मूल्‍य तो लागू कर देती है, लेकिन बाजार में उस मूल्‍य पर ही क्रय-विक्रय हो, इसको सुनिश्चित करने के लिए अभी तक कोई ठोस व्‍यवस्‍था नहीं है.

अपनी फसल लेकर बाजार पहुंचने वाले किसान को अनाज उसी दर पर बेचने के लिए मजबूत होना पड़ता है, जिस औने-पोने दाम पर आढ़तिया फसल को खरीदना चाहता है. किसान के पास ऐसा कोई विकल्‍प मौजूद नहीं है, जिसके जरिए वह अपनी फसल को सरकार द्वारा निर्धारित मूल्‍य पर बेच सके. वहीं पूंजीपति-आढ़तियों और सरकार के बीच गठजोड़ के चलते, कोई ऐसी व्‍यवस्‍था भी नहीं है, जहां किसान अपनी शिकायत दर्ज करा सके. ऐसे में सरकार का फर्ज है कि वह सुनिश्चित करे कि बाजार में फसल उसी दर पर बिकेगी, जो दर एमएसपी के तहत तय की गई है.

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किसान महापंचायत के राष्‍ट्रीय अध्‍यक्ष रामपाल जाट

किसानों से ज्‍यादा आढ़तियों की है चिंता 
जी-डिजिटल से बातचीत में किसान महापंचायत के राष्‍ट्रीय अध्‍यक्ष रामपाल जाट ने बताया कि 2010 में स्‍वामीनाथन आयोग की सिफारिशों पर तत्‍कालीन यूपीए सरकार ने प्रश्‍नचिह्न लगा दिया. इसके पीछे तत्‍कालीन केंद्र सरकार का पक्ष था कि स्‍वामीनाथन कमेटी में शामिल सभी सदस्‍य ब्‍यूरोक्रेट हैं. लिहाजा, वह जनप्रतिनिधियों से स्‍वामीनाथन आयोग की सिफारिश के बारे में रायसुमारी करना चाहते हैं.

2010में तत्‍कालीन प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने एक कमेटी बनाई. इस कमेटी में हरियाणा के तत्‍कालीन मुख्‍यमंत्री के नेतृत्‍व में बिहार, बंगाल और पंजाब के मुख्‍यमंत्रियों को शामिल किया गया. इस कमेटी ने दिसंबर 2010 में अपनी रिपोर्ट दे दी. रिपोर्ट में कमेटी ने एमएसपी को लागत का डेढ़ गुना करने की सिफारिश की संस्‍तुति की. बाजवूद इसके, इन सिफारिशों को लागू नहीं किया गया. जिसके चलते किसानों को कोर्ट का दरवाजा खटखटाना पड़ा.

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किसान को अनाज उसी दर पर बेचने के लिए मजबूत होना पड़ता है, जिस औने-पोने दाम पर आढ़तिया फसल को खरीदना चाहता है. (प्रतीकात्‍मक फोटो)

कोर्ट ने इस विषय पर राज्‍य और केंद्र सरकार से जवाब मांगा लेकिन कांग्रेस के नेतृत्‍व वाली यूपीए सरकार ने इस पर कोई जवाब कोर्ट में दाखिल नहीं किया. 2014 में बीजेपी के नेतृत्‍व वाली एनडीए की सरकार के आने के बाद पहली बार 6 फरवरी 2015 को जवाब दाखिल किया गया. जिसमें कहा गया कि यदि हम इस अनुशंसा को लागू करते हैं तो बाजार विकृत हो जाएगा.