राष्ट्रीय खाना खाने लायक है या नहीं, इस सस्ते तकनीक से अासानी से पता चल जाएगा ?

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मध्यप्रदेश के खरगोन निवासी और आइआइटी पटना से केमिकल इंजीनियरिंग में बीटेक 23 वर्षीय मयंक तिवारी ने स्वदेशी फूड पाइजनिंग डिटेक्शन बायो सेंसर विकसित करने में सफलता पाई है। सस्ता और टिकाऊ यह सेंसर किसी भी खाद्य में मौजूद बैक्टीरिया और अन्य हानिकारक तत्वों की उपस्थिति का संकेत देता है।

वर्तमान में बेंगलुरू स्थित इंडियन साइंस सेंटर में प्रोजेक्ट असिस्टेंट के रूप में शोध कर रहे मयंक ने एक अन्य शोधार्थी सोनम कुमारी के साथ मिलकर यह डिवाइस विकसित की है। मध्यमवर्गीय परिवार से ताल्लुक रखने वाले मयंक ने बताया कि गृहनगर खरगोन में दूषित भोजन के कारण हुई एक दुखद घटना ने उन्हें इस शोध के लिए प्रेरित किया। उस समारोह में फूड पाइजनिंग (दूषित भोजन करने से उत्पन्न अस्वस्थता) ने सैकड़ों लोगों को अस्पताल पहुंचा दिया था। इस घटना ने मुझे विचलित कर दिया। विचार आया कि ऐसी कोई चीज होना चाहिए जिस पर भोजन डालते ही पता चल जाए कि यह खाने लायक है या नहीं। साल भर तक शोध किया और बायो सेंसर बनाने में सफल रहा।

मयंक ने बताया, इस सेंसर में एक विशेष चिप बनाकर लगाई गई है, जो माइक्रोमीटर चैनल पर आधारित है। इसमें एक फ्लूड (तरल) भी मौजूद है, जो खाद्यकणों के संपर्क में आते ही रासायनिक क्रिया कर उनमें मौजूद हानिकारक तत्वों का संकेत देने में सहायक है। धारणा है कि किसी भी खाद्य को गर्म करने के बाद उसमें बैक्टीरिया नष्ट हो जाते हैं, परंतु ऐसा नहीं है। उबालने पर तो ऐसा संभव है लेकिन केवल गर्म भर कर देने से ऐसा नहीं होता है।

खाने को गर्म करने पर बैक्टीरिया और अन्य हानिकारक तत्व (टॉक्सिक) उसमें बने रहते हैं। दूषित खाद्य के कुछ अंश को सेंसर पर रखते ही सेंसर में लगा संकेतक हरे से नीले रंग में बदल जाता है और बता देता है कि खाना खाने लायक नहीं है। अधिक सर्तकता बरतना हो तो खाने के टुकड़े को पानी में उबालने के बाद पुन: इसे सेंसर के जरिये जांचा जा सकता है। हानिकारक रसायन आदि की मौजूदगी का संकेत सेंसर दे देगा।

मयंक ने बताया कि उनके द्वारा तैयार डिवाइस की क्षमता 59 नैनो ग्राम प्रति मिलीमीटर है। इसमें पाए जाने वाले चैनल के माइक्रो फ्लूड से पदार्थ को पास कराया जाता है। जो रासायनिक क्रिया के बाद दूषित तत्वों का संकेत देता है। सेंसर को तैयार करने में करीब चार हजार रुपये का खर्च आया। इसका कई बार उपयोग किया जा सकता है।

मयंक ने बताया कि उनका यह शोध दो बड़े अंतरराष्ट्रीय जर्नल्स में प्रकाशित हुआ है। मयंक के गाइड प्रलय दास ने उन्हें इस शोध में मार्गदर्शन दिया। केमिकल साइंस एंड टेक्नोलॉजी में बीटेक करने वाले मयंक की इच्छा है कि जरूरतमंदों को कैंसर जैसी बीमारी में बेहतर व सस्ता उपचार मिले। इन दिनों वे ओवरी कैंसर से निजात दिलाने के लिए बेंगलुरू में शोध कर रहे हैं।

ताकि छोटे शहरों-गांवों में आ सके काम 
मयंक कहते हैं भारत में भंडारे या सामूहिक भोज का बहुत प्रचलन है। बड़े शहरों में तो इस तरह के आयोजनों में भोजन की गुणवत्ता जांचने के लिए खाद्य विभाग की टीम या अन्य साधन हैं, लेकिन छोटे शहरों व गांवों में कोई सुविधा नहीं। गांवों के स्कूलों में मिड-डे मील की गुणवत्ता की जांच भी जरूरी है। ऐसी जगहों पर फूड पाइजनिंग की घटना को रोकने के लिए यह स्वदेशी, सस्ती और टिकाऊ डिवाइस कारगर हो सकती है।

बड़ी उपलब्धि..
‘मयंक तिवारी द्वारा विकसित यह स्वदेशी व सस्ता फूड पाइजनिंग डिटेक्शन बायो सेंसर दूषित खाने से बीमार होने से बचाएगा। देश में सामूहिक भोज और मिड-डे मील आदि में फूड पाइजनिंग की घटनाएं अकसर सामने आती हैं। यह शोध निश्चित ही बड़ी उपलब्धि है।’

-डॉ. प्रलय दास, एसोसिएट प्रोफेसर, आइआइटी, पटना