रिश्ते में तो लालू-मुलायम समधी लगते हैं, दोनों के उत्थान-पतन की ये है कहानी, जानिए ….

0
1

यूपी-बिहार का सियासी मिजाज और माहौल लगभग एक-सा है। दोनों राज्यों के दो बड़े राजनीतिक घरानों की जाति,

नीति और नीयत भी एक सी है। मुलायम और लालू परिवार के उत्थान-पतन की दास्तान भी एक समान है।

चुनाव परिणाम के बाद परिणति में भी फर्क नहीं दिखा।

अब दोनों के वारिसों को सियासत में दोबारा वापसी की कोशिश भी एक साथ ही करनी होगी।

संयोग यह भी कि दोनों का सियासी दुश्मन भी एक ही दल है।

भाजपा के विकासवादी और राष्ट्रवादी राजनीति से परिवारवादी और जातिवादी दलों का मुकाबला इतना आसान नहीं होगा।

1970 के दशक में सियासत के दोनों धुरंधरों की राजनीति जेपी आंदोलन से शुरू हुई।

लोहिया की विचारधारा के सहारे दोनों आगे बढ़ते रहे। 1990 के दशक में दोनों की राजनीति एक साथ चमकी

और 2019 में एक ही जैसा अंजाम भी मिला।

लोकसभा चुनाव में दोनों सियासी परिवारों के उत्तराधिकारियों ने लगभग एक तरह की गलतियां की।

वोट बैंक की राजनीति में बिहार में लालू प्रसाद के पुत्र तेजस्वी यादव ने जातीय आधार पर पांच दलों का गठबंधन

बनाया। जीत के सपने सजाए।

परिवार-रिश्तेदार को भी प्रश्रय दिया।

पाटलिपुत्र से बहन मीसा भारती को उतारा और सारण से लालू के समधी चंद्रिका राय को।

किसी को कामयाबी नहीं मिली। कांग्रेस छोड़कर सबका सूपड़ा साफ हो गया। यूपी में भी मुलायम सिंह के पुत्र

अखिलेश यादव ने इसी मकसद से समाजवादी पार्टी के साथ मायावती की बहुजन समाज पार्टी का गठबंधन किया।

चुनाव लड़ा।

परिणाम आया तो बुरी तरह पराजित हुए। बिहार में न लालू प्रसाद की बेटी मीसा भारती जीत सकी, न यूपी में

मुलायम की बहू डिंपल यादव। जात-पात और परिवार के आधार पर राजनीति करने वालों के लिए यह बड़ा सबक

हो सकता है।