सरदार पटेल 10 वर्ष और जीवित रह जाते तो राम मंदिर और कश्मीर चुनावी मुद्दा न होता ….

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ये हैं अलाहर गांव के 101 वर्षीय प्रीती लाल कांबोज। उम्र के इस पड़ाव में भी आंखें दुरुस्त हैं।

हालांकि थोड़ा ऊंचा सुनाई देने लगा है। निरक्षर होते हुए भी राजनीतिक चर्चा में इनके सामने टिक पाना मुश्किल है।

अब तक हुए हर चुनाव में उत्साह के साथ मतदान किया है। इन दिनों शहर के चोपड़ा गार्डन में रह रहे हैं।

इन्होंने लोकतंत्र के महायज्ञ और देश की राजनीति में उतार-चढ़ाव पर दैनिक जागरण से अनुभव साझा किए।

कहते हैं अंग्रेजी हकुमत को करीब से देखा है।

राजनीति तो सरदार वल्लभ भाई पटेल और लाल बहादुर शास्त्री जैसे नेता करते थे।

यदि सरदार बल्लभ भाई पटेल 10 वर्ष और जीवित रहते तो आज राम मंदिर और कश्मीर मुद्दा न होता। वे ऐसे बड़े

मुद्दों को सुलझाने का माद्दा रखते थे। अब राजनीति का व्यापारीकरण हो गया है। वोट की राजनीति हो रही है।

हर मुद्दे को वोट की तराजू में तोला जा रहा है।

प्रीती लाल का कहना है कि अग्रेजों की गुलामी की पीड़ा तो जरूर थी, लेकिन अंग्रेज समय के पाबंद और नियमों के

पक्के थे। आज नेता वादे को कुछ मिनटों में भूल जाते हैं। वह जबान की कीमत नहीं जानते। कहते कुछ हैं और करते कुछ हैं।

चुनाव से पहले आचार-व्यवहार में शालीनता होती है, लेकिन बाद में गिरगिट की तरह रंग बदल लेते हैं।

किस-किसको कोसें, सब एक ही थाली के चट्टे-बट्टे हैं।