1000 साल पुराने ‘करिंगा’ का जानिये भोजपुरी के शेक्सपियर से क्या है लिंक

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बेशक लोक कलाओं में अपने समय-काल के समाज की आत्मा बसती है और लोक कलाएं संस्कृति की विरासत हैं,

लेकिन अब बदलते वक्त के साथ सैकड़ों-हजारों साल पुरानी उत्तर भारत की लोकनाट्य शैलियों की कई विधा अतीत की

यादों में ही सिमटकर रह गई है। भारतीय समाज में मनोरंजन का जरिया बने लोक नाट्य शैली के सैकड़ों नृत्य खत्म हो चुके

हैं, तो इतने ही अपने अंतिम दौर में हैं। जिस तरह से बचे लोक नृत्य अंतिम सांसें ले रहे हैं,

उससे लगता है कुछ दशकों में इनका भी कोई नामलेवा नहीं बचेगा।

डिजिटल क्रांति के युग में न तो इन नृत्य शैलियों के बारे में जानने की इच्छा रखने वाले बचे हैं और न ही इन्हें बताने

वाले कलाकार उपलब्ध हैं। आलम यह है कि अब तो इनकी जानकारी इंटरनेट पर भी उपलब्ध नहीं है।

इन्हीं में से उत्तर भारत की लोक एक नृत्य नाट्य शैली है ‘करिंगा नाच’, जो तकरीबन 1000 साल पुरानी हो चुकी है,

लेकिन अब लुप्त प्राय है। एक-दो दशक पहले तक इसके कुछ कलाकार अवध क्षेत्र के फैजाबाद, सुल्तानपुर, इलाहाबाद

(अब प्रयागराज), प्रतापगढ़ जिले में मिल भी जाते थे, लेकिन अब इन कलाकारों की संतानें इस नृत्य शैली को छोड़कर

नौकरी व अन्य रोजगार में लग चुकी हैं। वजह यह है कि यह नृत्य शैली कलाकारों को दो जून की रोटी भी नहीं मुहैया

करा पा रही है और न ही सरकार कोई सार्थक पहल कर रही है।

25 जनवरी की सुबह राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय (National School of Drama) के अंतर्मुख सभागार में

‘वृत्तचित्र विदेसिया एवं करिंगा’ की स्क्रीनिंग हुई तो दर्शक के रूप में मौजूद कमेटी के सदस्य भी यह जानकर हैरान

रह गए कि तकरीबन 1000 साल पुरानी नृत्य नाट्य शैली ‘करिंगा नाच’ का लगाव-जुड़ाव या फिर कहें नाता भोजपुरी

के महान रंगकर्मी भिखारी ठाकुर से भी रहा है।

दरअसल, ‘वृत्तचित्र विदेसिया एवं करिंगा’ सैकड़ों साल पुराने नृत्य शैली की खूबियों से रूबरू कराती है।

डॉक्यूमेंट्री फिल्म मेकर और रंगकर्मी केपी मौर्य बताते हैं, ‘लंबे समय से समूचे भारत में पारंपरिक लोकशैली के

नृत्य मनोरंजन के साथ-साथ आस्था की एक पवित्र अभिव्यक्ति भी रहे हैं,

क्योंकि प्रस्तुति के दौरान पौराणिक प्रसंग की अभिव्यक्ति लोक शैली के नृत्य के जरिये होती थी। सदियों तक कलाकारों

ने सच्चे मन से इन नाट्य शैली से जुड़े नृत्यों की सेवा भी की है, लेकिन अब समय के साथ इनका अस्तित्व भी खत्म

हो चला है। ‘करिंगा नाच’ का अस्तित्व 11-12वीं शताब्दी में आया था और अलग-अलग रूप-रंग के साथ पूरे उत्तर

भारत में खूब प्रचलित था।

इसकी लोकप्रियता का आलम यह था कि सैकड़ों सालों तक यह अमीर-गरीब के लिए खासकर ग्रामीण समाज में

मनोरंजन का साधन रहा।’ एनएसडी के शैक्षणिक विभाग ने इस डॉक्यूमेट्री की स्क्रीनिंग खासतौर यहां पर एक्टिंग

सीख रहे छात्रों के लिए की थी, ताकि वे इस विधा के बारे में और अधिक जान सकें।