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Black Carbon Impact on Himalaya ब्लैक कार्बन ने हिमालय को अपनी गिरफ्त में लेना शुरू कर दिया है।

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Black Carbon Impact on Himalaya ब्लैक कार्बन ने हिमालय को तेजी से अपनी गिरफ्त में लेना शुरू कर दिया है। 1.17 लाख वर्ग किमी दायरे वाले मध्य हिमालय क्षेत्र में इसकी मात्र दो से तीन गुना तक बढ़ गई है, जबकि पर्यावरण की गर्माहट में करीब 24 फीसद तक बढ़ोतरी हो गई है। मध्य हिमालयी क्षेत्र के अंतर्गत नेपाल से लेकर भूटान के बीच भारत का उत्तराखंड, हिमाचल और जम्मू-कश्मीर शामिल है। आर्यभट्ट प्रेक्षण विज्ञान शोध संस्थान (एरीज) के साथ शामिल भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान केंद्र (इसरो), दिल्ली विश्वविद्यालय व भारतीय प्रोद्यौगिकी संस्थान (आइआइटी) कानपुर के हालिया शोध में यह जानकारी निकलकर सामने आई है। इस बदलाव से ग्लेशियर के पिघलने की आशंका भी अधिक बढ़ गई है।

एरीज नैनीताल के वरिष्ठ वायुमंडलीय विज्ञानी डा. मनीष नाजा के अनुसार हिमालय में ब्लैक कार्बन की वास्तविकता जानने के लिए यह शोध किया गया। शोध में 2014 से 2017 के बीच के आंकड़े शामिल किए गए। शोध में पता चला है कि ब्लैक कार्बन की मात्र 1,500 नैनोग्राम से 2,500 के बीच जा पहुंची है। इससे पूर्व इसकी मात्र 800 से 900 नैनोग्राम मानी जाती थी।

ब्लैक कार्बन की मात्र बढ़ने से मध्य हिमालय का क्षेत्र गर्म हो गया है। जो गर्माहट पहले 31.7 वॉट प्रति वर्ग मीटर थी, अब बढ़कर 39.5 वॉट प्रति वर्ग मीटर हो गई है। यानी सूर्य की किरणों की ऊष्मा के आधार पर मापी गई 7.8 वॉट प्रति वर्ग मीटर की यह बढ़ोतरी करीब 24 फीसद हो चुकी है। इसीलिए ग्लेशियरों के पिघलने की आशंका पूर्व के मुकाबले अधिक बढ़ गई है। यही वजह है कि जो ग्लेशियर 50 साल पूर्व 2,077 किलोमीटर दायरे के थे वह धीरे-धीरे घटकर अब 1,590 किलोमीटर के रह गए हैं।
 

आग ने बढ़ाया ताप

डा. नाजा का कहना है कि हिमालय में ब्लैक कार्बन की मात्र बढ़ने का बड़ा कारण जंगलों की आग है। इसके बाद वाहनों से निकलने वाले कार्बन की मात्र का असर लकड़ी की आग की तुलना में अपेक्षाकृत कम पाया गया है। यह शोध ऑर्गेनिक व एलीमेंटल कार्बन पर किया गया था।

अंतरराष्ट्रीय जर्नल में प्रकाशित हुआ शोध

शोध छात्र प्रियंका श्रीवास्तव के मुताबिक यह शोध 2021 के नए अंक में एशिया पेसिफिक जर्नल ऑफ एटमास्फेरिक साइंसेज कोरिया में प्रकाशित हो चुका है। शोध आधुनिक मास एब्जाप्र्शन क्रास सेक्शन (मैक) तकनीकी की मदद से किया गया। भविष्य में भी यह पैरामीटर ग्लोबल वार्मिग, जलवायु, मौसम का पूर्वानुमान व सुधार में बेहद उपयोगी साबित होगा। इससे हिमालय क्षेत्र के ब्लैक कार्बन का सटीक अनुमान लगा है।

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